वंदना के पापा इधर से उधर कभी किसी को डांटते हुए तो कभी फूलों की लड़ियों को ठीक करते हुए घूम रहे थे ….अजीब से भाव थे उनके चेहरे पे आज …क्यों न हो आज उनकी इकलौती बेटी की शादी जो थी …कभी हलवाई को समझाते हुए की खाना तो देसी घी में ही बनेगा और कभी कोने में जाकर कुर्ते से अपने आंसू पोंछते …काम सब कर रहे थे पर मन में छोटी वंदना की शरारतें चेहरे पर मुस्कान लाती,और साथ ही उसे विदा करने का ख्याल ही उन्हें विचलित कर रहा था….
माँ भी रीती रिवाज़ निभाने के साथ साथ मेहमानों का भी ख्याल रख रही थी परन्तु जितनी बार भी वंदना की तरफ देखती तो आँखें गीली हो जाती …आखिर वो लम्हा आ ही गया ,वो लम्हा था कन्यादान का …वंदना का हाथ रोहन के हाथ में देते हुए वंदना के पापा एकदम मौन थे कितना कुछ कहना चाहते थे जैसे “मैं अपनी जमा पूँजी सौंप रहा हूँ आपको अपनी बेटी के रूप में ,इसकी ख़ुशी ही है मेरे जीवन स्वरुप में “
माँ सिर्फ ये कहना चाहती थी “थोड़ा सा डांटने पर ही आँसू बहाती है,अगर कोई गलती हो जाए तो समझ लेना छोटी है ” परन्तु दोनों में से कोई कुछ ना कह पाया मानो शब्द गले में अटक गए हो …
सच में ईश्वर ने एक लड़की के माता पिता को इतना मजबूत बनाया है की जो शादी से पहले या बचपन में भी किसी के यहाँ भेजने से पहले सौ बार सोचते थे वही आज उसे आँखों में अश्रू लिए और दिल से दुआ देकर विदा करते है| कितनी अनकही बातें ,भावनाएं अपने दिल में छुपा लेते है |
” दान ” अर्थात स्वेच्छा से कुछ भी देना ,पर ईश्वर ने कन्यादान बेटियों के माँ- पापा के हिस्से में क्यों लिखा ..ये “पुत्रदान “भी तो हो सकता था …?
ये सच है कुछ सवालों के जवाब हमें कभी नहीं मिल पाएंगे … ये ज़िन्दगी के रास्ते यूँ ही कटते जायेंगे….
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पढ़ते समय आंसूं बह निकले।सुंदर माता पिता के स्नेह की याद दिलाती भावनात्मक प्रस्तुति।👌🙏🏼
बहुत बहुत धन्यवाद ...🙏