ना जाने कहां खो गई है वह दिवाली, जिसकी करते थे एक महीने पहले से तैयारी
घर घर बनते थे नए नए पकवान, क्योंकि आते थे त्यौहार पर ढेरों मेहमान
एक दूसरे के घर खील ,बताशे और मिठाई प्लेट में सजाकर ले जाते थे ,नए नए कपड़े पहन कर खूब इतराते थे
आम के पत्तों और गेंदे के फूल की बंदनवार लगाते थे ,सब मिलकर खुशियों की दिवाली मनाते थे
दिवाली दिवाली जैसी नहीं लगती ऐसा मैंने बहुत लोगों से सुना
क्योंकि अब हमने सब कुछ रेडीमेड ही चुना
अब तो दिवाली के भी कई नाम हो गए ,ग्रीन दिवाली क्लीन दिवाली जैसे वैरीअंट हो गए
मिठाइयां भी शुगर फ्री हो गई ,रिश्तो में भी मिठास कम हो गई
इन्हीं कारणों से मेरी दिवाली कहीं खो गई… मेरी दिवाली कहीं खो गई
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