समुन्द्र मंथन के समय कार्तिक माह के त्रयोदशी के दिन भगवान् धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे , इसलिए इस दिन को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।
संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसके मन में संतोष रुपी धन का वास होता है वह सबसे बड़ा धनवान है। इसलिए धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की प्रथा है , क्योंकि चाँदी चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है। भगवान धन्वंतरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन बर्तन खरीदने की भी परंपरा है। माना जाता है इस दिन वस्तु खरीदने से उसमे तेरह गुना वृद्धि होती है ।
भगवान् धन्वंतरि देवताओं के चिकित्सक हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं ,इसलिए भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस घोषित किया है|
धनतेरस के दिन शाम को घर के बाहर मुख्य द्वार पर दीपक जलाने की भी प्रथा है। इसके पीछे एक लोककथा प्रचलित है –
एक हेम नामक राजा थे , ईश्वर की कृपा से उन्हें पुत्र रतन की प्राप्ति हुई परन्तु बालक की कुंडली देखकर ज्योतिषों ने यह भविष्यवाणी की — जिस दिन बालक का विवाह होगा उसके ठीक चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा ने इस बात से चिंतित होकर राजकुमार को ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ किसी स्त्री की परछाई भी उस पर न पड़े।
परन्तु विधि के विधान को कौन टाल सकता है , एक दिन एक सुन्दर राजकुमारी उधर से गुजरी और राजकुमार उस पर मोहित हो गए। जल्द ही दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया। विवाह के चार दिन पश्चात ही यमदूत राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। नवविवाहित पत्नी का विलाप सुनकर यमदूत का ह्रदय भी पिघल गया परन्तु उन्हें अपना कार्य पूरा करना पड़ा |
यमदूत ने ये सारा वृतांत यमराज को जाकर सुनाया और उनसे विनती की – कि ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। तब यम देवता बोले — अकाल मृत्यु तो क्रम की गति है , फिर भी इससे बचने का उपाय है -“कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी कि रात को जो मनुष्य मेरे नाम से पूजन करके दीपक दक्षिण दिशा में भेंट करता है (जलाता है ), उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।” यही कारण है लोग इस दिन घर के बाहर मुख्य द्वार पर दीपक जलाते हैं।
जैन धर्म में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ भी कहते हैं। त्रयोदशी के दिन भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि अंतिम बार गूंजी थी| इस दिन को धन्य माना गया क्योंकि इसके बाद भगवान ने योग निरोध किया तथा अमावस्या को मोक्ष प्राप्त कर लिया। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके दो दिन बाद दीपावली के दिन भगवान् महावीर निर्वाण को प्राप्त हुए और इसी दिन भगवान् महावीर के प्रमुख गणधर गौतम स्वामी को भी कैवल्य ज्ञान कि प्राप्ति हुई थी। इसलिए दीपावली को जैन धर्म में भी धूमधाम से मनाया जाता हैं।
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