शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं को रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। मकर संक्रान्ति से सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से धीरे-धीरे रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। इसलिए सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है और मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।
भगवान सूर्य शनि देव के पिता हैं और दोनों में शत्रुवत सम्बन्ध हैं। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं। पौराणिक कथा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन पिता सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं, सूर्य शनि का एक साथ होना शुभ और विशेष माना जाता है। सूर्य का शनि ग्रह की राशि में जाने पर पुत्र को पिता का आदर सम्मान करने का अवसर प्राप्त होता है और सूर्य शनि से सम्बंधित अशुभ योग कम करता है। बारह माह में सूर्य बारह राशिओं में विचरण करता है। सूर्य का राशि भ्रमण अप्रैल माह में मेष राशि से प्रारम्भ होता है, सूर्य का राशि बदलना ही संक्रांति कहलाता है। मकर राशि सूर्य के पुत्र शनि की राशि है इसलिए जब सूर्य का मिलन अपने पुत्र के साथ होता है वो विशेष हो जाता है, और मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन ही महाभारत युद्ध में घायल भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने के पश्चात परलोक गमन के लिए प्राण त्यागे थे।
इस दिन से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन देवी गंगा जी भागीरथ जी के साथ सागर से मिली थी। इसी के साथ गंगा जी की यात्रा पूर्ण हुई ।
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।
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