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    मिट्टी के दिये

    दोस्तों कैसी रही आप सबकी दिवाली ..उम्मीद है बढ़िया ही रही होगी ..आप सोच रहे होंगे दिवाली तो अब अगले साल आएगी तो आज ये “मिट्टी के दिये” कविता क्यों ….मन में कुछ विचार आया तो सोचा क्यों ना आप सब के साथ कुछ पंक्तियों के माध्यम से साझा करूं..…

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    कहां खो गई मेरी वाली दिवाली

    ना जाने कहां खो गई है वह दिवाली, जिसकी करते थे एक महीने पहले से तैयारी घर घर बनते थे नए नए पकवान, क्योंकि आते थे त्यौहार पर ढेरों मेहमान एक दूसरे के घर खील ,बताशे और मिठाई प्लेट में सजाकर ले जाते थे ,नए नए कपड़े पहन कर खूब…

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    मन की मशीन

    ध्वनि रोज़ की तरह नम आँखों से घर का काम कर रही थी बार बार उसे यहीं ख्याल परेशान कर रहा था की उसने राहुल के साथ शादी करके गलती तो नहीं की ….शादी सिर्फ एक शब्द नहीं एक ज़िम्मेदारी है ….ये राहुल को भी समझना चाहिए…पहले और अब में…

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    सोलह श्रृंगार के 16 भाव

    पहला श्रृंगार है स्नान जिसमें मैंने नकारात्मक सोच को ना दिया मान दूसरा श्रृंगार बिंदी का ऊंचा रखूंगी अपना आत्मसम्मान तीसरा श्रृंगार सिंदूर कालाल रंग सा उज्जवल हो मेरा भविष्य चौथा श्रृंगार काजल काबुरी नजर से बचे मेरा परिवार पांचवा श्रृंगार मेहंदी का दिखलाता है भाव सहनशीलता का छठा श्रृंगार…

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    काश !

    काश! का है जो एहसासवह होता है सब के पास बचपन से ही काश! साए की तरह बुढ़ापे तक साथ निभाता हैवक्त के साथ काश! भी बदलता जाता है काश! मैंने मेहनत की होती तो आज मैं डॉक्टर होता काश! मैंने अपनी सेहत का ख्याल रखा होता तो मेरा बुढ़ापा…