चाय का प्याली से,फूलों का डाली से कुछ ऐसा रिश्ता है मेरा और मेरे दोस्त का जो कभी था अनजान ,आज मेरा दोस्त कहलाता है ना जाने इतना अटूट रिश्ता कैसे बन जाता है हर सुख दुख में मेरा साथी है हां वो मेरा हमराही मेरा दोस्त मेरा जीवन साथी…
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“आदमी की औकात” – दिवंगत जैन मुनि तरुण सागर जी द्वारा रचित कविता
फिर घमंड कैसाघी का एक लोटा,लकड़ियों का ढेर,कुछ मिनटों में राख…..बस इतनी-सी हैआदमी की औकात !!!! एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया,अपनी सारी ज़िन्दगी,परिवार के नाम कर गया,कहीं रोने की सुगबुगाहट,तो कहीं ये फुसफुसाहट….अरे जल्दी ले चलोकौन रखेगा सारी रात…..बस इतनी-सी हैआदमी की औकात!!!! मरने के बाद नीचे देखा…