वो बुधवार का दिन था और दिसंबर की रात थी…
ना पापा जानते थे ना मैं वो हमारी आखरी मुलाक़ात थी….
पापा ने सर पर हाथ फेरा और बिठाया अपने पास…
नज़रें बता रही थी उन्हें मुझसे मिलने की थी आस…

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आंखों में समंदर सा गहरा पानी…. मुस्कान से छुपा ली उन्होंने अपनी दर्द की कहानी…
समय की कीमत जानते थे, हमेशा दूसरों के बारे में सोचना….
बोले “कोहरे की रात है समय से निकलना “
निकलते हुए ये न पता था की “फिर कब आएगी मिनी “ये पापा से न कभी सुन पाऊँगी..
कल को उनकी आवाज़ के लिए तरस जाऊँगी…
आज भी याद है वो ICU के 9 नंबर के बेड पर बीप बीप बजना…
और डॉक्टर का हमें बुलाकर ” I AM SORRY” कहना…
फिर भी हुआ न यकीन दौड़ी पापा के पास..
हाथ उठाकर सर पर रखा, थी पापा के बोलने की आस..
बहुत कुछ चाहती थी बोलना और आपसे सीखना…
कैसे कर लेते थे आप निस्वार्थ प्यार इतना…
आपका कोट, आपकी घड़ी, आपकी डायरी पेन सब यही हैं..
सब कुछ है यहाँ बस आप ही नहीं है…
इस काव्यांश को लिखने का एक ही मकसद है…
हम सबको अपनों को वक़्त पर वक़्त देने की बहुत ज़रुरत है….
© हनी जैन



