जमानें के तानों से..बेबुनियाद इल्ज़ामों से..बीते हुए अफ़सानो से..थक गई हूँ ….पर हारी नहीं हूँ मैं.. बेवज़ह नफ़रतों से …मतलबी जरूरतों से..एक तरफ़ा समझोतों से…थक गई हूँ ….पर हारी नहीं हूँ मैं…. अब अपने आँसू खुद ही पोंछ लेती हूँ..होठों पर लफ्ज़ आने से पहले ही रोक लेती हूँ..अपने लिए…